प्राकृतिक आपदाएं किसे कहते हैं

प्राकृतिक आपदाएं किसे कहते हैं

प्राकृतिक आपदाएं

प्राकृतिक आपदाएं विनाशकारी, अप्रत्‍याशित और अनियंत्रित घटनाएं हैं। जैसे भूकम्‍प, ज्‍वालामुखी, चक्रवात, सूखा, बाढ़, सुनामी, मृदा अपरदन आदि

natural disasters

भूकम्‍प

भारत को तीन भूकम्‍प क्षेत्रों में बांटा गया है- हिमालय क्षेत्र, गंगा-सिधुं का मैदान तथा प्रायद्वीपीय क्षेत्र।

हिमालय क्षेत्र- सबसे अधिक भूकम्‍प प्रभावित क्षेत्र माना गया है। हिमालय क्षेत्रों में 1828 ई० में कश्‍मीर का भूकम्‍प तथा 1991 में आया गढ़वाल भूकम्‍प विशेष विनाशकारी रहा।

गंगा सिंधु का क्षेत्र- यह हिमालय क्षेत्र सन्निकट होने के बावजूद भी अधिक विनाशकारी नहीं है। इस क्षेत्र में 1803 ई० में दिल्‍ली का भूकम्‍प तथा 1934 ई० में बिहार के भूकम्‍प ने जानमाल को काफी क्षति पहुंचाई।

प्रायद्वीपीय क्षेत्र- इस क्षेत्र को पहले स्थिर भू-भाग माना जाता था किन्‍तु यह भाग अब जब भूकम्‍प संभावित क्षेत्र में शामिल है। इस क्षेत्र में 1618 ई० में बम्‍बई का भूकम्‍प तथा 1993 में महाराष्‍ट्र के लातूर (उस्‍मानाबाद) जिले में आया भूकम्‍प जिसमें 40,000 लोगों की मृत्‍यु हो गयी।

भू-स्‍खलन



आधार शैलों या आवरण प्रस्‍तर को भारी मात्रा में तेजी से खिसकना ही भू-स्‍खलन कहलाता है। ढालों पर से मृदा और चटटानों का प्राकृतिक रूप से हट जाना वृहद क्षरण कहलाता है।

भू-स्‍खलन का परिणाम ढालों की तीव्रता, चटटानों के संस्‍तरण तल, वनस्‍पति आवरण की मात्रा तथा चटटानों में वलन और भ्रंशन पर निर्भर करता है। भू-राजस्‍व को प्रेरित करने का मुख्‍य कारण ढाल के ऊपर स्थित बोझ तथा जल जैसे स्‍नेहक की उपस्थिति ही है।

सुनामी

महासागरों का तीव्र से विस्‍थापन तरंगों का एक क्रम उत्‍पन्‍न करना ही सुनामी कहलाता है। भु-स्‍खलन, ज्‍वालामुखी विस्‍फोट भूकम्‍प इत्‍यादि के कारण सुनामी उत्‍पन्‍न होती है। सुनामी की घटनांए प्रशांत महासागर में घटित होती है, यद्वपि यह एक विश्‍वव्‍यापी घटना है। वर्ष 2004 में हिन्‍द महासागर में आए सुनामी के कारण अंडमान निकोबार के कई द्वीप जलमग्‍न हो गये थे।

ज्‍वालामुखी

सर्वप्रथम भारत में दक्षिण पठार पर आर्कियन युग के धारवाड़ काल में ज्‍वालामुखी का 1 अरब वर्ष पूर्व उदगार हुआ। इसका मुख्‍य केन्‍द्र झारखण्‍ड में डाल्‍मा श्रेणी था। दूसरा उदगार कुडप्‍पा काल में तमिलनाडु के कुडप्‍पा जिले तथा मध्‍य प्रदेश के ग्‍वालियर जिले में हुआ। तीसरा ज्‍वालमुखी उदगार विंध्‍यकाल में हुआ। इसका केन्‍द्र जोधपुर के निकट मालानी था। यह लावा करीब 42,000 वर्ग किमी में फैला हुआ है।

पुराजीव कल्‍प में ज्‍वालामुखी के उदगार हुमायूं हिमालय में हुए जिसके मुख्‍य केन्‍द्र नैनीताल जिले के भुवाली, भीमताल थे। ऊपरी कार्बन युग में ज्‍वालामुखी केक उदगार विशेषत: पीर-पंजाल और लददाख श्रेणी में हुए। मध्‍यजीव कल्‍प में करीब 15 करोड़ वर्ष पूर्व ज्‍वालामुखी के उदगार राजमहल की पहाडि़यों में हुए। भारत के अंडमान द्वीपसमूह के नारकोंडम और बैरन में जाग्रत ज्‍वालामुखी पाए जाते हैं।

चक्रवात

चक्रवात अपने पूरे तंत्र के साथ करीब 20 किमी० प्रति घंटा की औसत गति से आगे बढ़ता है। चक्रवात की जीवन अवधि 5-7 दिनों की होती है। 600 किमी या इससे अधिक व्‍यास वाले चक्रवात अधिक विनाशक और भंयकर होते हैं। विश्‍व में आने वाले कुल चक्रवातों में से 6 प्रतिशत भारत में आते हैं।

संघनन के बाद मुक्‍त ऊष्‍मा चक्रवात के लिए गतिज ऊजा में बदल जाती है। उष्‍ण कटिबंधीय चक्रवातों में दाब प्रवणता अधिक होती है। उष्‍ण कटिबंधीय चक्रवात से सामान्‍यत: 50 सेमी से अधिक वर्षा होती है। कभी-कभी 100 सेमी से भी अधिक वर्षा हो जाती है।

बाढ़

भारत विश्‍व का सर्वाधिक बाढ़ग्रस्‍त क्षेत्र है। देश के कुल 3290 लाख हेक्‍टेयर भौगो‍लिक क्षेत्र में से 400 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र बाढ़ग्रस्‍त है। बाढ़ से हुई कुल क्षति का करीब 33 प्रतिशत उत्‍तर प्रदेश को, 27 प्रतिशत बिहार को तथा करीब 15 प्रतिशत पंजाब व हरियाणा को वहन करना पड़ता है। 1954 ई० में राष्‍ट्रीय बांढ नियंत्रण कार्यक्रम प्रारम्‍भ किया गया।

सूखा

मानसून की अनिश्चितता के कारण भारत में औसतन प्रति 5 वर्षों में एक सूखा पड़ता है। देश के कुल क्षेत्रफल के 35 प्रतिशत भाग ऐसे हैं जहां औसतन 75 सेमी से भी कम वर्षा होती है।

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