UTTAR PRADESH KE LOK NRITYA- उत्‍तर प्रदेश के लोक नृत्‍य

UTTAR PRADESH KE LOK NRITYA- उत्‍तर प्रदेश के लोक नृत्‍य

 

उत्‍तर प्रदेश लोक नृत्‍य

उत्‍तर प्रदेश - कला और संस्‍कृति

भारतीय संस्‍कृति दुनिया की सबसे समृद्ध व प्राचीन संस्‍कृति है। देखा जाए तो दूसरे देशों की संस्‍कृतियां समय के साथ नष्‍ट होती रही हैं। लेकिन भारतीय संस्‍कृति आदिकाल से ही अपने पुराने अस्तित्‍व को खुद में समेटे हुए है। इसके अलावा कभी भी भारत की प्राकृतिक विविधता संस्‍कृतियों में बाधक नहीं बनी हैं। भारतीय जहां भी गये उन्‍होंने भारतीय संस्‍कृति की एक अनुज छाप छोड़ी है।




भारत में नृत्‍य की परंपरा काफी प्राचीन है। माना जाता है कि भारतीय शास्‍त्र मं दर्ज ककुल चौंसठ कलाओं में मौजूद नृत्‍य कला काफी प्रभावशाली है। नृत्‍य के बारे में कहा जाता है कि ये कला हर किसी का मन मोह लेने में सक्षम है। साथ ही नृत्‍य कला एक ऐसी खूबसूरत कला है जो किसी के भी जीवन को आन्‍नद से भर देती है। कहीं नृत्‍य को आन्‍नद का प्रतीक बताया गया है तो कहीं देश में भरत मुनि के नाटय शास्‍त्र को भारतीय नृत्‍यकला का सबसे पहला और प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसके अलावा हड़प्‍पा सभ्‍यता की खुदाई से निकली नृत्‍य की मू‍र्तियां भी इस बात की गवाह हैं कि उस दौर में भी नृत्‍यकला का विकास हो चुका था। शास्‍त्रीय और पारंपरिक नृत्‍य से लेकर लोकनृत्‍य और आदिवासियों के नृत्‍य तक, भारत में कई तरह केक नृत्‍य प्रचलित हैं। इनमें भारत नाटयम, मो‍हिनी अटटम, कुचीपुड़ी और कत्‍थक जैसे कई अन्‍य शास्‍त्रीय नृत्‍य शुमार हैं। आइये जानते हैं कि क्‍या है उत्‍तर प्रदेश के शास्‍त्रीय नृत्‍य, उत्‍तर प्रदेश के शास्‍त्रीय नृत्‍य के घरानों के बारे में साथ ही जानते हैं कि‍ उत्‍तर प्रदेश की लोक नृत्‍य के बारे में।

कत्‍थक नृत्‍य

कत्‍थक उत्‍तर प्रदेश का एक मात्र शास्‍त्रीय और पारंपरिक लोकनृत्‍य है। माना जाता है कि भारत के आठ शास्‍त्रीय नृत्‍यों में शुमार कत्‍थक नृत्‍य सबसे पुराना नृत्‍य है। इसकी उत्‍पत्ति ब्रजभूमि की रासलीला से हुई है। कत्‍थक नृत्‍य की विद्धा को जटिल पद चालनों और चक्‍करों के इस्‍तेमाल के प्रयोग से पहचाना जाता है। देखा जाए तो कत्‍थक शब्‍द की उत्‍पत्ति कथा शब्‍द से हुई है जिसका अर्थ किसी कहानी से है। कहा जाता है कि कत्‍थक नृत्‍य शैली में कथन को ओर ज्‍यादा प्रभावशाली बनाने के लिए स्‍वांग और मुद्राएं बाद में जोड़ी गयी। जिससे वर्णनात्‍मक नृत्‍य के एक सरल रूप का विकास हुआ। वैश्‍णों धर्म और भक्ति आन्‍दोलन में लयआत्‍मक और संगीतात्‍मक रूपों के एक सम्‍पूर्ण प्रसार के लिए सहयोग दिया। मुगलों के भारत बाद कत्‍थक नृत्‍य शैली मंदिरों के बाद दरबारों में विकसित हुई। मुगलकाल के दौरान कत्‍थक नृत्‍य शैली में ईरानी वेशभूषा का प्रचलन बढ़ा। आगे कत्‍थक की शास्‍त्रीय शैली को बीसवीं शताब्‍दी में लेडी लीला सोखे के जरिए आगे बढ़ाया गया। कत्‍थक की प्रस्‍तति में कुछ घटक होते हैं, इनमें आनन्‍द, ठाट, तोड़े और टुकड़े, जुगलबंदी, पंढत और गत भाव जैसे घटक शामिल हैं।

उत्‍तर प्रदेश के कत्‍थक घरानें में लखनऊ घराना और वाराणसी घराना शामिल है। कत्‍थक का लखनऊ घराना नवाब वाजिद अली शाह के शासन काल में आगे बढ़ा। तो वहीं कत्‍थक का वाराणसी घराना विकास जानकी प्रसाद के नेतृत्‍व में आगे बढ़ा। कत्‍थक नृत्‍य में ध्रुवपद शैली के गायन का इस्‍तेमाल होता है। मुगलकाल के दौरान तराना, ठुमरी और गजल को कत्‍थक नृत्‍य में शामिल किया गया। कत्‍थक नृत्‍य के लिए ठाकुर प्रसाद, शम्‍भू महाराज, तारादेवी, सितारा देवी, बिरजू महाराज, लच्‍छू महाराज, अच्‍चन महाराज जैसे कत्‍थक नृत्‍य के कलाकार खूब मशहूर रहे हैं। प्रदेश के चार संस्‍थानों द्वारा कतथक में स्‍नातक की डिग्री दी जाती है। इनमें बनारस हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय, आगरा विश्‍वविद्यालय, भरतखण्‍डे संगीत संस्‍थान लखनऊ और राष्‍ट्रीय कत्‍थक संस्‍थान लखनऊ जैसे संस्‍थान इनमें शामिल हैं।

उत्‍तर प्रदेश के लोक नृत्‍यों में कई लोक नृत्‍य शुमार हैं। इनमें सबसे पहला है.....

ख्‍याल नृत्‍य

अक्‍सर लड़के के जन्‍म पर ख्‍याल नृत्‍य का आयोजन बुन्‍देलखंड में किया जाता है। इस नृत्‍य में रंगीन कागजों पर बांसों की सहायता से मंदिर बनाकर और फिर उसे सर पर रखकर नृत्‍य किया जाता है।

रासनृत्‍य है

रासनृत्‍य को ब्रज रासलीला के नाम से भी जाना जाता है। इस नृत्‍य की शुरूआत उत्‍तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र से हुई है। यह नृत्‍य एक नाटय रूप है। जो अब कई भारतीय राज्‍यों में किया जाता है। ब्रज रासलीला में भगवान कृष्‍ण के आकर्षक बचपन, किशोरावस्‍था और शुरूआती जीवन का जिक्र होता है।

झूला नृत्‍य

झूला नृत्‍य भी ब्रज क्षेत्र का नृत्‍य है, जिसका आयोजन श्रावण मास में किया जाता है। इस नृत्‍य को इस क्षेत्र के मंदिरों में बड़े उल्‍लास के साथ किया जाता है।

मयूर नृत्‍य

मयूर नृत्‍य भी ब्रज क्षेत्र का ही एक नृत्‍य है। इसमें नर्तक मोर के पंख से बने विशेष वस्‍त्र धारण करते हैं।

धोबिया नृत्‍य

धोबिया नृत्‍य पूवांचल में प्रचलित है। यह नृत्‍य धोबी समुदार द्वारा किया जाता है। इसके जरिए धोबी और गदहे के बीच आजीविका संबंधों का वर्णन होता है। धोबी जाति द्वारा मृदंग रणसिंगा, झांझ, डेढ़ताल, घुंघरू, घंटी बजाकर नाचा जाने वाला यह नृत्‍य है। कहा जाता है कि जिस उत्‍सव में ये नृत्‍य नहीं होता, उस उत्‍सव को अधूरा माना जाता है।   

चरकुला नृत्‍य

चरकुला नृत्‍य ब्रज क्षेत्रवासियों द्वारा किया जाता है। ये नृत्‍य ब्रज क्षेत्र में होली के मौके पर किया जाता है। जिसमें 108 दीपको का चरकुला यानी पिंजरा सर पर रखकर महिलांए नृत्‍य करती हैं।

कठघोड़वा नृत्‍य

कठघोड़वा नृत्‍य पूवांचल में मांगलिक अवसरों पर किया जाता है। इसमें एक नृतक अन्‍य नर्तकों के घेरे के अंदर कृत्रिम घोड़ी पर बैठकर नृत्‍य करता है।

जोगिनी नृत्‍य

जोगिनी नृत्‍य खासकर रामनवमी के मौके पर किया जाता है। इस नृत्‍य में साधु या कोई अन्‍य पुरूष महिला का रूप धारण करके नृत्‍य करते हैं। ये नृत्‍य अवध में किया जाता है।

धींवर नृत्‍य

धींवर नृत्‍य अनेक शुभ अवसरों पर विशेषकर कहार जाति के लोगों द्वारा आयोजित किया जाता है।

शौरा नृत्‍य

शौरा या सैरा नृत्‍य बुदंलखण्‍ड के कृषक अपनी फसलों को काटते समय खुशी जाहिर करने के मकसद से करते हैं।

कर्मा नृत्‍य

कर्मा व शीला नृत्‍य सोनभद्र और मिर्जापर के खरवार आदिवासी समूह द्वारा आयोजित किया जाता है।

पासी नृत्‍य

पासी नृत्‍य पासी जाति के लोगों द्वारा सात अलग-अलग मुद्राओं की एक गति और एक लय में युद्ध की भांति किया जाता है।

घोड़ा नृत्‍य

घोड़ा नृत्‍य बुंदेलखण्‍ड में मांगलिक अवसरों पर बाजों की धुन पर घोड़ों द्वारा करवाया जाता है।

धुरिया नृत्‍य

धुरिया नृत्‍य को बुदेलखण्‍ड के प्रजापति यानि कुम्‍हार स्‍त्री वेश धारण करके करते हैं।

छोलिया नृत्‍य

छोलिया नृत्‍य राजपूत जाति के लोगों द्वारा विवाहोत्‍सव पर किया जाता है। इसे करते समय नर्तकों के एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में ढाल होती है।

छपेली नृत्‍य

छपेली नृत्‍य एक हाथ में रूमाल और दूसरे हाथ में दर्पण लेकर किया जाता है। इसके जरिए नर्तक आध्‍यात्मिक समुन्‍नति की कामना करते हैं।

नटवरी नृत्‍य

नटवरी नृत्‍य पूर्वांचल क्षेत्र यानि यादव समुदायों के लोगों द्वारा किया जाता है। यह नृत्‍य गीत व नक्‍कारों के सुरों पर किया जाता है।

देवी नृत्‍य

देवी नृत्‍य बुदेंलखण्‍ड में ज्‍यादा प्रचलित है। इस लोक नृत्‍य में एक नर्तक देवी का स्‍वरूप धारण करके अन्‍य नर्तकों के सामने खड़ा रहता है। और उसके सम्‍मुख शेष सभी नर्तक नृत्‍य करते हैं।

राई नृत्‍य

राई नृत्‍य बुदेलखण्‍ड की महिलाओं द्वारा किया जाता है। यहां की महिलांए इस नृत्‍य को खासतौर पर श्री कृष्‍ण जन्‍मा‍ष्‍टमी के अवसर पर करती हैं। इसको मयूर की भांति किया जाता है, इसीलिए यह मयूर नृत्‍य भी कहलाता है।

दीप नृत्‍य

दीप नृत्‍य बुदेंलखण्‍ड में किया जाता है। बुदेंलखण्‍ड के अहीरों समुदाय के लोग अनेकानेक दीपकों को प्रज्‍जवलित कर किसी घड़े, कलश या थाल में रखकर प्रज्‍जवलित दीपकों को सिर पर रखकर दीप नृत्‍य किया जाता है।

पाई डण्‍डा नृत्‍य

ये नृत्‍य भी बुदेंलखण्‍ड में ही प्रचलित है। देखा जाए तो पाई डण्‍डा नृत्य गुजरात के डाण्डिया नृत्‍य के समान है जो कि बुदेंलखण्‍ड के अहीरों द्वारा किया जाता है।

कार्तिक नृत्‍य

कार्तिक नृत्‍य का प्रचलन भी बुदेंलखण्‍ड क्षेत्र में ही है। ये नृत्‍य कार्तिक माह में नर्तकों द्वारा श्री कृष्‍ण और गोपियों का रूप धारण कर किया जाता है।

कलाबाज नृत्‍य

कलाबाज नृत्‍य अवध क्षेत्र के नर्तकों द्वारा किया जाता है। इस नृत्‍य में नर्तक मोरबाजा लेकर कच्‍ची घोड़ी पर बैठकर नृत्‍य करते हैं।

मोरपंख व दीवारी नृत्‍य

ब्रज की लटठमार होली की तरह बुदेंलखण्‍ड भी खासकर चित्रकूट में दीपावली के दिन ढोल-नगाड़े की तान पर आकर्षक वेशभूषा के साथ मोरपंखधारी लठैत एक दूसरे पर ताबड़तोड़ वार करते हुए मोरपंख व दीवारी नृत्‍य व खेल का प्रदर्शन करते हैं।

ठडिया नृत्‍य

सोनभद्र व पड़ोसी जिले में संतान की कामना पूरी होने पर ठडिया नृत्‍य का आयोजन सरस्‍वती के चरणों में समर्पित होकर किया जाता है।

चौलर नृत्‍य

मिर्जापुर और सोनभद्र आदि जिलों में चौलर नृत्‍य अच्‍छी वर्षा तथा अच्‍छी फसल की कामना पूर्ति हेतु किया जाता है।

ढेढि़या नृत्‍य

ढेढि़या नृत्‍य का प्रचलन दो-आब क्षेत्र में है, जो प्रमुखत: फतेहपुर जिले में प्रचलित है। राम के लंका विजय के पश्‍चात वापस आने पर स्‍वागत में किकया जाता है। इसमें सिर पर छिद्रयुक्‍त मिटटी के बर्तन में दीपक रखकर किया जाता है।

ढरकहरी नृत्‍य

सोनभद्र की जनजातियों द्वारा ढरकहरी नृत्‍य का आयोजन किया जाता है।

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