तिरंगे झंडे में चरखे की जगह अशोक चक्र को क्‍यों रखा गया

तिरंगे झंडे में चरखे की जगह अशोक चक्र को क्‍यों रखा गया

 

तिरंगे झंडे में चरखे की जगह अशोक चक्र को क्‍यों रखा गया

तिरंगे झंडे में चरखे की जगह अशोक चक्र को क्‍यों रखा गया

तीन रंगों की पटिटयों से बना एक कपड़ा जिसमें सबसे ऊपर केसरिया रंग है, बीच में सफेद रंग और सबसे नीचे हरा रंग है। सफेद रंग की पट्टी में नीले रंग का एक चक्र है जिसमें 24 तीलियां हैं। यह कपड़ा कोई आम कपड़ा नहीं है बल्कि हमारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज है, जो हर भारतीय को गौरव की अनुभूति कराता है।

झंडे के तीन रंगों का इतिहास

1921 में बेजवाडा में एक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में एक आंध्र के युवा पिंगली वेंकयया ने सबसे पहले भारत का झंडा डिजाइन किया। जो महात्‍मा गांधी को बहुत पसन्‍द आया। ये उस वक्‍त दो रंगो लाल एवं हरे रंग का था। गांधी जी ने देश के प्रगति के प्रतीक के लिए एक सफेद पटटी और चरखा जोड़ने का सुझाव दिया। साल 1931 में संकल्‍प के माध्‍यम से तिरगें झंडे को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया था।

झंडे के रंगों को लेकर स्‍पष्‍टीकरण

1931 में गांधी जी ने इसको लेकर स्‍पष्‍ट किया था कि झंडे में जो रंग शामिल हुए हैं वह किसी भी धार्मिक प्रतीक के रूप में शामिल नहीं किये गये हैं। आगे जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा में राष्‍ट्रीय ध्‍वज से जुड़े प्रस्‍ताव के समय गांधी जी की बात को और स्‍पष्‍टता के साथ दोहराया और कहा कि कई लोग मानते हैं कि झंडे का कोई हिस्‍सा इस या उस समुदाय की नुमाईंदगी करता है, लेकिन मैं कह सकता हूं। जब ये झंडा तैयार किया गया तो कोई साम्‍प्रदायिक संकेत नहीं जोड़े गये। हम झंडे का एक ऐसा डिजाइन चाहते थे जो खूबसूरत हो, क्‍योंकि देश का चिन्‍ह हर हाल में खूबसूरत होना चाहिहए। हमने एक ऐसे झंडे के बारे में सोचा जो पूरे तौर पर और अपने हर हिस्‍से से एक मूल के जज्‍बे का इजहार करे। उसकी परंपराओं का इजहार करे। इसके अलावा एक ऐसी मिली-जुली भावना और पंरपरा को खुद में समेटे हो। जो हजारों साल की यात्रा में हिन्‍दुस्‍तान में पनपी हो।

राष्‍ट्रीय ध्‍वज में रंगों और चक्र का महत्‍व संविधान सभा में विचारक और आगे चलकर भारत के पहले उपराष्‍ट्रपति बने डा० सर्वपल्‍ली राधा क्रष्‍णन ने वर्णन किया था। उन्‍होंने समझाया कि भगवा रंग त्‍याग या विरक्ति को दर्शाता है। हमारे नेताओं को भौतिक लाभ के प्रति उदासीन होना चाहिए। और अपने काम के प्रति खुद को समर्पित करना चाहिए।

केन्‍द्र में सफेद रंग एक दैवीय प्रकाश की भांति है, जो हमारे लिए सत्‍य के मार्ग पर चलने और हमारे आचरण का एक गाइड है।

हरे रंगा का सम्‍बन्‍ध हमारी अपनी मिटटी से है। और पौधों से हमारे जीवन के संबंध को दर्शाता है।

सफेद पटटी के बीच में अशोक चक्र धर्म के नियम का पहिया है। सत्‍य, धर्म या सदाचार इस ध्‍वज के तहत काम करने वालों के सिद्धान्‍त होने चाहिए। साथ ही ये चक्र गति को दर्शाता है। जैसा कि कहा जाता है कि ठहराव में मृत्‍यु है और आवागमन में जीवन है। भारत को और अधिक परिवर्तन का विरोध नहीं करना चाहिए। और हमें आगे बढ़ना चाहिए। पहिया एक शान्तिपूर्ण परिवर्तन की गतिशीलता का प्रतिनिधित्‍व करता है।

संविधान सभा में राष्‍ट्रीय ध्‍वज को लेकर नेहरू के विचार-

22 जुलाई, 1947 आजादी से करीब 20 दिन पहले पं० जवाहर लाल नेहरू संविधान सभा में राष्‍ट्रीय ध्‍वज से जुड़ा प्रस्‍ता रखने के लिए खड़े हुए। इस प्रस्‍ताव को रखने के समय उन्‍होंने राष्‍ट्रीय ध्‍वज से जुड़े तकनीकी पहलुओं को सबसे पहले रखा। उन्‍होंने बताया कि भारत का राष्‍ट्र ध्‍वज तिरंगा होगा। जिसमें के‍सरिया, सफेद और गहरा हरा रंग समानुपात में होगा। बीच में सफेद पटटी के बीच नीले रंग का चक्र होगा। जो चरखा को निरूपित करेगा। चक्र का डिजाइन उसी तरह का होगा जिस तरह का डिजाइन सारनाथ में रखी अशोक की लाट के चक्र का है। चक्र का व्‍यास सफेद रंग की पटटी की चौड़ाई के अनुपात में होगा। झंडे की चौड़ाई और लंम्‍बाई में सामान्‍य रूप से 2:3 का अनुपात होगा। किसी ऊचीं इमारत और फहराने के लिए झंडे का अनुपात 2:3 की जगह 2:1 भी रखा जा सकता है। खासकर इसे विदेशों में दूतावासों पर फहराते समय बदला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि झंडा पहली बार सामने पेश किकया जा रहा था। इन्‍हीं तीन रंगों से बना ध्‍वज भारत स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलन में हर देशवासी के हाथ में मौजूद था।

सफेद पटटी पर पहले चरखा बना था। जो भारत की आम आदमी का प्रतीक था। जिनकी मेहनत का प्रतीक था और महात्‍मा गांधी के उन सन्‍देश से आया था, जो हमें दे रहे थे। अब झंडे में चरखे के प्रतीक में थोड़ी तब्‍दीली की गयी है। हांलाकि इसे पूरी तरह हटाया नहीं गया। आमतौर पर यही माना जाता है कि झंडे के एक तरफ बना चिन्‍ह दूसरी तरु भी हू-बहू वैसा ही होना चाहिए। दरअसल ऐसा नहीं होने पर एक दिक्‍कत होती है जो नियमों के खिलाफ जाती है। झंडे पर पहले मौजूद चरखे को एक तरफ से देखे तो एक तरफ चक्र दिखता है। और दूसरी तरफ हत्‍था दिखता है। वहीं दूसरी और देखे तो चक्र और हत्‍था की अदला-बदली हो जाती है। यह एक व्‍यवहारिक दिक्‍कत थी। इसलिए खूब सोच-विचार के बाद हम इस बात से इत्‍तेफाक रखते हैं किक जिस प्रतीक ने लोगों में जोश भरा है। उसे बना रहना चाहिए। लेकिकन उसकी शक्‍ल थोड़ी बदल देनी चाहिए।  

लेकिन अब समस्‍या यह है कि चक्र किस तरह का होना चाहिए। ऐसे में हमारा दिमाग भी किसी चक्र पर गया। जो कई जगहों पर खुदा हुआ है। जिसे हम सबने देखा है। और यह है अशोक की लाट के ऊपर बना चक्र। यह भारत की संस्‍कृति का प्रतीक है। यह और भी बहुत सी चीजों का प्रतीक है। इस तरह हमने झंडे में न सिर्फ इस मोहर को जोड़ दिया बल्कि इस तरह से अशोक के नाम को जोड़ दिया है। अशोक एक ऐसा नाम जो न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के इतिहास में सबसे मशहूर नामों में से एक है।

राष्‍ट्रीय ध्‍वज से जुड़े कानून

सरकार ने समय-समय पर जारी सांविधिक और वैधानिक विदेशों के माध्‍यम से ध्‍वज फहराने को विनियमित करने के लिए कानून बनाए हैं। यह प्र‍तीक और नाम (अनुचित उपयोग की रोकथाम) अधिनियम, 1950 तथा राष्‍ट्रीय सम्‍मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 द्वारा भी नियन्त्रित किया जाता है। संसद ने भारतीय ध्‍वज संहिता 2002 बनाई। जो 26 जनवरी 2002 से प्रभावी हुई। जिसमें पहले कि भारतीय ध्‍वज संहिता को अमान्‍य कर दिया। देखा जाए तो नई संहिता बहुत व्‍यापक दस्‍तावेज है। जो राष्‍ट्रीय ध्‍वज से सम्‍बन्धित प्रावधानों को शामिल करती है। इसके तीन भाग हैं। संहिता के भाग-एक में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के भाग-दो में सार्वजनिक, निजि संगठनों और शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के लिए समर्पित है। और संहिता का तीसरा और अन्तिम भाग केन्‍द्र और राज्‍य सरकारों और उनके संगठनों और एजेसिंयो द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन को सम्‍बन्धित है।

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