Sardar bhagat singh mother biography

Sardar bhagat singh mother biography

 सरदार भगतसिंह की #वीर_माता_विद्यावती_कौर_जी की आज पुण्यतिथि है।

सरदार भगत सिंह और उनकी माता जी



इतिहास इस बात का साक्षी है कि #देश, धर्म और #समाज की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वालों के मन पर ऐसे संस्कार उनकी माताओं ने ही डाले हैं। भारत के स्वाधीनता संग्राम में हंसते हुए फांसी चढ़ने वाले वीरों में #भगतसिंह का नाम प्रमुख है। उस वीर की माता थीं श्रीमती विद्यावती कौर ।


#विद्यावती_जी का पूरा जीवन अनेक विडम्बनाओं और झंझावातों के बीच बीता। सरदार किशनसिंह से विवाह के बाद जब वे ससुराल आयीं, तो यहां का वातावरण देशभक्ति से परिपूर्ण था। उनके देवर सरदार #अजीतसिंह देश से बाहर रहकर स्वाधीनता की अलख जगा रहे थे। स्वाधीनता प्राप्ति से कुछ समय पूर्व ही वे भारत लौटे; पर देश को विभाजित होते देख उनके मन को इतनी चोट लगी कि उन्होंने 15 अगस्त, #1947 को सांस ऊपर खींचकर देह त्याग दी। उनके दूसरे देवर सरदार स्वर्णसिंह भी जेल की यातनाएं सहते हुए #बलिदान हुए। उनके पति किशनसिंह का भी एक पैर घर में, तो दूसरा जेल और कचहरी में रहता था। विद्यावती जी के बड़े पुत्र जगतसिंह की 11 वर्ष की आयु में सन्निपात से मृत्यु हुई। भगतसिंह 23 वर्ष की आयु में फांसी चढ़ गये, तो उससे छोटे कुलतार सिंह और #कुलवीर सिंह भी कई वर्ष जेल में रहे।


के इन जेलयात्राओं और मुकदमेबाजी से खेती चैपट हो गयी तथा घर की चैखटें तक बिक गयीं। इसी बीच घर में डाका भी पड़ गया। एक बार चोर उनके बैलों की जोड़ी ही चुरा ले गये, तो बाढ़ के पानी से गांव का जर्जर मकान भी बह गया। ईष्र्यालु पड़ोसियों ने उनकी पकी फसल जला दी। 1939-40 में सरदार #किशनसिंह जी को लकवा मार गया। उन्हें खुद चार बार सांप ने काटा; पर उच्च मनोबल की धनी माताजी हर बार घरेलू उपचार और झाड़फंक से ठीक हो गयीं। भगतसिंह, सुखदेव और #राजगुरु की फांसी का समाचार सुनकर उन्होंने दिल पर पत्थर रख लिया क्योंकि भगतसिंह ने उनसे एक बार कहा था कि बाद लोग उन मालाओं के फूल चुनकर अपने घर ले गये। जहां माताजी बैठी  थीं, वहां की धूल लोगों ने सिर पर लगाई। सैकड़ों माताओं ने अपने बच्चों को माताजी के पैरों पर रखा, जिससे वे भी भगतसिंह जैसे वीर बन सकें। 1947 के बाद गांधीवादी सत्याग्रहियों को अनेक शासकीय सुविधाएं मिलीं; पर क्रांतिकारी प्रायः उपेक्षित ही रह गये। उनमें से कई गुमनामी में बहुत कष्ट का जीवन बिता रहे थे। माताजी उन सबको अपना पुत्र ही मानती थीं। वे उनकी खोज खबर लेकर उनसे मिलने जाती थीं तथा सरकार की ओर से उन्हें मिलने वाली पेंशन की राशि चुपचाप वहां तकिये के नीचे रख देती थीं। इस प्रकार एक सार्थक और सुदीर्घ जीवन जीकर माताजी ने दिल्ली के एक अस्पताल में एक जून, 1975 को अंतिम सांस ली। उस समय उनके मन में यह सुखद अनुभूति थी कि अब भगतसिंह से उनके बिछोह की अवधि सदा


के लिए समाप्त हो रही है।


वीर माता की इच्छा थी कि जहाँ इन क्रांतिकारियों का “पुत्रों समाधि है “वहीं पर हमारा दाह संस्कार करें “आज #फ़िरोज़पुर में (हुसैनिवाला) में पंजाब माता समाधि है। लोग आकर अपना श्रद्धासुमन चढ़ाते हैं। कितने कष्ट सहे माता ने, युग समान व सदी गयी । अमृत पुत्रों के रहते फिर, भारत माता त्रस्त ना हो ।

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